आसान नहीं थी आईपीएस बनने की राह !

 27 Nov 2020  167

संजय मिश्रा/in24 न्यूज़/रायगढ़    

     भोजराम पटेल छत्तीसगढ़ राज्य के रायगढ़ जिले के तारापुर गांव के रहनेवाले हैं. उनके पिता का नाम महेश राम पटेल है और वह प्राइमरी तक की ही शिक्षा ग्रहण किए हैं. भोजराम पटेल की माता का नाम लीलावती पटेल है और वह अनपढ़ हैं. जीवन-यापन करने के लिए उनके पास सिर्फ 2 बीघा जमीन के अलावा और कुछ भी नहीं था. भोजराम ने गांव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई की, उन्होंने अपने जीवन के इन सभी कठिनाईयों को सहर्ष स्वीकार किया. भोजराम ने कुछ करने के उद्देश्य से शिक्षा की सीढ़ी बनाने का संकल्प लिया. वह एक संविदा शिक्षक बने, परंतु उनका लक्ष्य यह न होकर कुछ और ही था. भोजराम के माता-पिता कम पढ़े-लिखे होने के बाद भी शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते थे इसलिए उन्होंने भोजराम को हमेशा पढ़ाई-लिखाई के लिए प्रेरित किया करते थे. भोजराम अपनी स्कूली शिक्षा के समय अपने माता-पिता के साथ खेतो में भी हाथ बंटाते थे. उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद भोजराम का चयन शिक्षा कर्मी वर्ग 2 के पद पर हो गया. उसके बाद उन्होंने मिडिल स्कूल में शिक्षक के पद पर अध्यापन का कार्य किया तथा स्कूल से छुट्टी मिलने पर सिविल सर्विस की पढ़ाई पर भी ध्यान केंद्रित किया. भोजराम की लगन, मेहनत तथा माता-पिता की मेहनत रंग लाई और  भोजराम सिविल सर्विस के परीक्षा में सफल हुए. आज वह एक आईपीएस हैं. भोजराम बताते हैं कि उन्होंने गरीबी को बेहद नजदीक से देखा है. एक समय था, जब पेट भरना बहुत बड़ी चुनौती थी. घर में अनाज न होने की वजह से उनकी मां दाल या सब्जी में अधिक मिर्च डाल देती थी ताकी भूख जल्दी शांत हो जाए और कम भूख लगे. उन्होंने बताया कि जिस सरकारी स्कूल से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की, उसी स्कूल के बच्चों को पढ़ने में सहायता करते हैं. वे कहते हैं कि जीवन में कुछ हासिल करने के लिए शिक्षा ही एक मात्रा साधन है.

      आईपीएस भोज राम पटेल की यह कहानी नहीं बल्कि सच्चाई और संघर्ष की एक ऐसी मिसाल है जो आज की युवा पीढ़ी को प्रेरणा देती है. बिना कोचिंग और बिना किसी संसाधन के भोज राम ने साल 2014 में यूपीएससी क्वालीफाई करते हुए आईपीएस का पद हासिल किया. उन्हें नहीं पता था कि वे आईएएस बनेंगे या आईपीएस, लेकिन कड़ी मेहनत और संघर्ष के दम पर उन्होंने यह मुकाम आखिरकार हासिल कर ही लिया. उनकी मां तो बस इतना ही जानती है कि बेटा पुलिस में है और जब कभी कोई मुसीबत में रहता है तब बेटे को जाना पड़ता है. भोजराम कहते हैं कि मां पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन इसके बावजूद उनके प्रोत्साहन और आशीर्वाद के दम पर मैं इस मुकाम तक पहुंच पाया हूं. राजभवन में एडीसी रहने के बाद भोजराम की पोस्टिंग बतौर एसपी कांकेर में हुई. यह था भूखे पेट खेतों में हल चलाने वाले भोजराम का शिक्षाकर्मी से एसपी बनने तक का सफर, जिसे वे आज भी याद करते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती है.