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टीबी मरीजों के नाम पर 200 करोड़ का घोटाला! प्रधानमंत्री कार्यालय की रिपोर्ट में दिल्ली सरकार के अधिकारियों पर गिरी गाज

04 Aug, 2026 55

प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ की एक गोपनीय रिपोर्ट ने दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों रुपये के टीबी स्क्रीनिंग मशीन घोटाले का पर्दाफाश कर दिया। पीएमओ की टीम ने 6 महीने तक चली जांच के बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी जिसमें बताया गया कि 2023 से 2025 के बीच दिल्ली के सरकारी अस्पतालों और मोहल्ला क्लीनिकों के लिए खरीदी गई टीबी जांच मशीनों में बड़े पैमाने पर अनियमितता हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक 180 करोड़ रुपये की मशीनों की खरीद में 65 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है। रिपोर्ट आते ही केंद्र सरकार ने हरकत में आते हुए दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के 4 वरिष्ठ अधिकारियों और 2 सप्लायर कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए। अब तक 3 अधिकारियों को निलंबित किया जा चुका है और सीबीआई जांच की सिफारिश की गई है। ये घोटाला ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली में टीबी के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।


पूरा घोटाला कैसे हुआ - टेंडर से लेकर सप्लाई तक
पीएमओ रिपोर्ट के अनुसार 2023 में दिल्ली सरकार ने "टीबी मुक्त दिल्ली अभियान" के तहत 200 नई डिजिटल चेस्ट एक्स-रे स्क्रीनिंग मशीन खरीदने का टेंडर निकाला था। टेंडर की शर्त थी कि मशीनें जापान या जर्मनी की बनी हों और उनकी कीमत 8-9 लाख रुपये प्रति मशीन हो। लेकिन जांच में पता चला कि सप्लायर कंपनी ने चीन में बनी पुरानी मशीनों को नया पेंट करके 18 लाख रुपये प्रति मशीन के हिसाब से बेच दिया। कुल 200 मशीनों की जगह सिर्फ 120 मशीन ही अस्पतालों तक पहुंची और उनमें से भी 40 मशीनें खराब निकलीं। टेंडर प्रक्रिया में भी गड़बड़ी की गई। 3 कंपनियों के अलावा किसी और को टेंडर में हिस्सा ही नहीं लेने दिया गया। फाइल में फर्जी सर्टिफिकेट लगाए गए और टेक्निकल कमेटी की रिपोर्ट बदल दी गई। सबसे बड़ा खुलासा ये हुआ कि मशीनें खरीदने के बाद उनकी मेंटेनेंस के नाम पर हर साल 12 करोड़ रुपये अलग से निकाले गए जबकि मशीनें अभी वारंटी में थीं।


 किसे हुआ नुकसान - मरीज और सरकार दोनों
इस घोटाले की सबसे बड़ी मार दिल्ली के गरीब TB मरीजों पर पड़ी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में हर साल 60 हजार नए TB केस सामने आते हैं। स्क्रीनिंग मशीन कम होने की वजह से कई मरीजों का समय पर निदान नहीं हो पाया। सफदरजंग और अलअन्नजेपी अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि मशीनें खराब होने के कारण मरीजों को प्राइवेट लैब में 2000-3000 रुपये देकर टेस्ट कराना पड़ा। एक मरीज की मां ने कहा "हम सरकारी अस्पताल 4 बार गए। हर बार मशीन खराब बता देते थे। बाद में उधार लेकर प्राइवेट में कराया।" सरकार को भी 65 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ। साथ ही केंद्र सरकार से मिलने वाला "निक्षय" फंड भी रुक गया क्योंकि केंद्र ने कहा कि जब तक जांच पूरी नहीं होती तब तक पैसा नहीं देंगे। डब्लूएच्नऔ भी इस रिपोर्ट पर चिंता जताई है।


 सरकार की कार्रवाई और राजनीतिक बवाल
पीएमओ रिपोर्ट आने के बाद केंद्र ने तुरंत दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव, खरीद विभाग के डायरेक्टर और 2 संयुक्त सचिव को निलंबित कर दिया। दिल्ली के उपराज्यपाल ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं। ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। भाजपा ने कहा कि "ये दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार की नई कहानी है। गरीबों के इलाज के पैसे भी खा गए।" आम आदमी पार्टी ने पलटवार करते हुए कहा कि "ये केंद्र की साजिश है। टेंडर एलजी ऑफिस से पास हुआ था।" कांग्रेस ने मांग की कि मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि "दोषी कोई भी हो बख्शा नहीं जाएगा। 30 दिन में नई मशीनें खरीदी जाएंगी।" कोर्ट ने भी इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सरकार से 2 हफ्ते में स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।


 निष्कर्ष और आगे का रास्ता
टीबी भारत की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है। 2025 तक टीबी खत्म करने का लक्ष्य था लेकिन घोटालों की वजह से वो दूर होता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब स्वास्थ्य खरीद में पूरी पारदर्शिता लानी होगी। पहला, सभी टेंडर जयम पोर्टल पर ही हों। दूसरा, मशीन आने पर थर्ड पार्टी से जांच हो। तीसरा, हर अस्पताल में मशीन का क्यूआर कोड लगे ताकि आम लोग देख सकें कि मशीन काम कर रही है या नहीं। पीएमओ की इस रिपोर्ट ने एक बार फिर दिखाया कि भ्रष्टाचार सीधा आम आदमी की जान से खिलवाड़ है। अगर समय पर मशीनें लग जातीं तो हजारों मरीजों की जान बच सकती थी। अब जरूरी है कि दोषियों को कड़ी सजा मिले और दिल्ली को जल्द से जल्द नई स्क्रीनिंग मशीनें मिलें ताकि "टीबी मुक्त भारत" का सपना सच हो सके।

 

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