बीएमसी चुनाव में दांव पर ठाकरे की विरासत, 15 जनवरी को होगा मतदान
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बाद अब बारी 74 हज़ार करोड़ रुपए के बजट वाली बीएमसी चुनाव की है। चार साल की देरी बाद हो रहे चुनाव के दौरान बीएमसी की कहानी महाराष्ट्र की राजनीति की एक ऐसी रोमांचक और जटिल गाथा बनने वाली है। जिसमें सत्ता, विरासत, विश्वासघात और पुनरुत्थान के तत्व आपस में गुंथे हुए हैं। बीएमसी चुनाव का राजनीतिक दांव इतना ऊंचा है कि ये न केवल मुंबई की सत्ता तय करेगा, बल्कि महाराष्ट्र और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है। लेकिन इन सबके बीच यदि किसी के लिए चुनौती सबसे बड़ी है तो वो हैं उद्धव ठाकरे। क्यों की उद्धव ठाकरे के सामने अपना आखिरी किला बचाए रखने की चुनौती है।
उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी चुनाव केवल एक निकाय चुनाव नहीं है। बल्कि अपनी सियासी विरासत को बचाने का आखिरी मौका है। दरअसल उद्धव पहले ही महाराष्ट्र की सत्ता पहले ही गंवा चुके हैं और सिर्फ सत्ता ही नहीं बल्कि पार्टी और बालासाहेब ठाकरे की विरासत भी उनके हाथों से निकल गई है। वहीं, महाराष्ट्र की सत्ता पर पूरी तरह से काबिज होने के बाद बीजेपी की नजर बीएमसी पर है। इस बहाने मुंबई की सियासत पर अपना दबदबा बीजेपी कायम रखना चाहती है।
बीएमसी की 227 पार्षद सीटें हैं, मेयर बनाने के लिए 114 सीटों की जरूरत है। उद्धव ठाकरे के साथ रहते हुए बीजेपी मुंबई की सियासत पर अपना वर्चस्व कायम नहीं कर सकी, लेकिन अब एकनाथ शिंदे के सहारे फतह करने का प्लान बनाया है। वहीं बीजेपी को रोकने के लिए और अपना आखिरी सियासी दुर्ग को बचाए रखने के लिए उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे से हाथ मिला लिया है।
करीब एक दशक की राजनीतिक दूरी को पाटते हुए शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे और एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे साथ आने की तैयारी पूरी कर ली है। दोनों दलों के नेताओं के बीच चल रही सीट शेयरिंग पर बातचीत के बीच ये लगभग तय माना जा रहा है कि आगामी बीएमसी चुनाव में ठाकरे बंधु संयुक्त मोर्चा बनाएंगे।
सूत्रों के मुताबिक, इस गठबंधन की रणनीति का केंद्र मराठी-मुस्लिम समीकरण होगा। इसके तहत मुंबई की कुल 227 सीटों में से 72 मराठी बहुल और 41 मुस्लिम प्रभाव वाले वार्डों पर विशेष फोकस किया जाएगा। माना जा रहा है कि यही सामाजिक समीकरण के चलते 2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को गोवंडी, मानखुर्द, बायकुला और माहिम जैसे इलाकों में फायदा पहुंचा था।
सीट शेयरिंग के प्रारंभिक फॉर्मूले के तहत शिवसेना यूबीटी 140 से 150 सीटों पर, जबकि एमएनएस 60 से 70 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। हालांकि, बातचीत चार प्रमुख मराठी गढ़ों- वर्ली, दादर-माहिम, शिवड़ी और विक्रोली-भांडुप पर आकर अटक गई है।
दरअसल मनसे इलाकों में चुनाव लड़ने पर अड़ी है, जबकि ये क्षेत्र फिलहाल उद्धव ठाकरे की पार्टी के विधायकों के प्रभाव वाले माने जाते हैं और पारंपरिक तौर पर ‘मराठी मानूस’ की राजनीति का केंद्र रहे हैं। वहीं जहां एक ओर उद्धव ठाकरे अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधे रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज ठाकरे के जिम्मे मराठी मतदाताओं को जोश दिलाने की भूमिका होगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक राज ठाकरे मुंबई में जोरदार और आक्रामक भाषणों के जरिए मराठी अस्मिता को फिर से केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे।
जानकारी के मुताबिक ठाकरे बंधु अपनी एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन करने के लिए मुंबई में तीन संयुक्त रैलियां भी कर सकते हैं। इन रैलियों के जरिए ये संदेश देने की कोशिश होगी कि बीएमसी चुनाव में मुकाबला सीधा ठाकरे बनाम महायुति का है।
सूत्रों का कहना है कि उद्धव और राज ठाकरे आमने-सामने बैठक कर सीटों को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने की कोशिश करेंगे। इस बैठक के बाद गठबंधन की औपचारिक घोषणा और बीएमसी चुनाव के लिए साझा रणनीति सामने आने की संभावना है। वहीं देखना ये होगा कि बीएमसी चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स कैसे फडणवीस-शिंदे की जोड़ी से पार पाते हैं? आपको बता दें कि बीएमसी की सत्ता साढ़े तीन दशक से उद्धव ठाकरे की शिवसेना के हाथों है। भले ही महाराष्ट्र की सत्ता बदलती रही, लेकिन मुंबई की राजनीति पर उद्धव का कब्जा बरकरार रहा।
1996 से लेकर 2022 तक शिवसेना यूबीटी का मेयर चुना जाता रहा है। जिसकी वजह ये रही कि शिवसेना की सियासत मुंबई से शुरू हुई और सियासी आधार भी यहीं पर है। साल 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर बीजेपी के साथ गए तो मुंबई से बाहर के नेताओं का साथ मिला। लेकिन मुंबई के नेता और ज्यादातर विधायक उद्धव ठाकरे के साथ खड़े रहे। यानी मुंबई की सियासत पर उद्धव की पकड़ बनी रही, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना यूबीटी को झटका लगा।
पार्टी महज कुछ सीटों पर सिमट कर रह गई। लिहाजा अब मुंबई की सियासत में उद्धव अपनी पकड़ बनाए रखना चाहेंगे क्यों यदि वे जीते, तो असली शिवसेना का दावा मजबूत होगा पर हारे, तो पार्टी का अंत निकट लगेगा। वहीं शिवसेना यूबीटी को बीएमसी की सत्ता से हटाकर ही असली चोट देने के फिराक में बीजेपी है। यानी उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी चुनाव जीतना केवल एक नगर निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व और विरासत की सबसे बड़ी लड़ाई है।
करीब तीन दशकों तक बीएमसी पर अविभाजित शिवसेना का कब्जा रहा है, लेकिन 2022 के विभाजन के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। एकनाथ शिंदे की बगावत और चुनाव आयोग द्वारा उन्हें असली शिवसेना और धनुष-बाण का प्रतीक दिए जाने के बाद, उद्धव ठाकरे के लिए ये साबित करना जरूरी है कि जनता का समर्थन अभी भी ठाकरे परिवार के साथ है।
वहीं बीएमसी का चुनाव जीतकर ये उद्धव ठाकरे संदेश देना चाहेंगे कि मुंबई का शिवसैनिक अभी भी मातोश्री के प्रति वफादार है। वहीं महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर होने के बाद बीएमसी ही उद्धव ठाकरे के लिए आर्थिक पावर हाउस है। बीएमसी का बजट भारत के कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी अधिक है। बीएमसी का अनुमानित बजट लगभग 74,427 करोड़ रुपये से अधिक है। ऐसे में बीएमसी की सत्ता पर रहने वाले राजनीतिक के लिए भी सियासी तौर पर काफी अहम है।
बीएमसी की वित्तीय शक्ति शिवसेना को अपने जमीनी नेटवर्क और शाखाओं को चलाने और चुनावी मशीनरी को मजबूत बनाए रखने में मदद करती रही है। सत्ता खोने का मतलब इस आर्थिक आधार का हाथ से निकल जाना होगा। ऐसे में बीएमसी की सत्ता में रहने के चलते उद्धव को अपनी पार्टी में नई ऊर्जा बनाए हुए हैं, उसे अगर बाहर हो जाएंगे तो मुश्किल होगी। दरअसल शिवसेना की पूरी राजनीति मुंबई और मराठी अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती है।
मुंबई को ठाकरे परिवार का किला माना जाता है। ऐसे में बीजेपी और शिंदे गुट मिलकर बीएमसी पर कब्जा कर लेता है, तो ये उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक झटका होगा, जिससे उनकी क्षेत्रीय राजनीति का आधार कमजोर हो सकता है।
बीजेपी ने बीएमसी की 227 पार्षद सीटों में से 150 सीटें जीतने का टारगेट रखा है। वहीं शिवसेना की किसी समय मुंबई पर जबरदस्त पकड़ थी, लेकिन 2014 से उसकी स्थिति कमजोर हुई है। साल 2017 के बीएमसी चुनाव में शिवसेना-बीजेपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, जिससे उद्धव ठाकरे को नुकसान और बीजेपी को लाभ हुआ था।
बीएमसी की 227 सीट में शिवसेना को 84 सीटें और बीजेपी ने 82 सीटों पर कब्जा जमाया था। उद्धव ठाकरे को अपना मेयर बनाने के लिए बीजेपी से हाथ मिलाना पड़ा था, जिसके बाद ही शिवसेना की किशोरी पेडणेकर महापौर बन सकी थी। हालांकि, अब हालत बदल गए हैं। उद्धव के कई पार्षद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए हैं। उनकी जगह नए चेहरों को मैदान में उतारा जाएगा।
उद्धव ठाकरे को 50 फीसदी सीटों पर नए चेहरे तलाश करने होंगे। बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना को खड़ा किया, उसका शक्ति केंद्र हमेशा मुंबई रहा है। उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल होने के चलते शिवसेना के लोगों का मनोबल गिरा हुआ है। सत्ता अपने आप में एक अलग ऊर्जा और उत्साह देती है, जो बीजेपी के नेताओं में दिख रहा है. ऐसे में उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ हाथ मिला लिया है।
विरासत को बचाने की आखिरी कोशिश मानी जा रही है। उद्धव के लिए यह चुनाव ये दिखाने का मौका है कि विरासत केवल नाम या चुनाव चिह्न से नहीं, बल्कि जनसमर्थन से चलती है। उद्धव ठाकरे ने खुद इसे अपनी पार्टी के लिए अग्निपरीक्षा बताया है। महायुति की एकजुट घेराबंदी के बीच अगर वे बीएमसी बचा लेते हैं, तो ये 2029 के विधानसभा चुनावों के लिए उनकी बड़ी वापसी का आधार बनेगा। यही वजह है कि उद्धव ठाकरे ने पूरी ताकत बीएमसी के चुनाव पर लगा दी है।