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क्रूड ऑयल  प्राइस  कच्चे तेल की कीमतों से बढ़ी टेंशन, भारत का ऑयल  इम्पोर्ट बिल 61 प्रतिशत तक उछला

21 Jul, 2026 45
नई दिल्ली, 2026
पश्चिम एशिया संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसका सीधा असर भारत पर पड़ा है। बराबर मात्रा में तेल खरीदने के बाद भी भारत का ऑयल इंपोर्ट बिल 61% तक बढ़ गया है।
मई 2026 में भी यही ट्रेंड रहा। 2.16 करोड़ टन तेल के लिए 18.7 अरब डॉलर चुकाने पड़े, जबकि मई 2025 में 2.13 करोड़ टन के लिए सिर्फ 10 अरब डॉलर लगे थे। उस समय कीमत 64.04 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मई 2026 में 106.23 डॉलर प्रति बैरल हो गई।
 
क्यों महंगा हुआ तेल?
पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट की वजह से सप्लाई कम हुई है। इसी वजह से ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया है।
भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों का असर सीधा पड़ता है।
 
इकॉनमी पर क्या असर पड़ेगा?
- महंगाई: तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट कॉस्ट मनुफैक्रिंग और खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- करंट अकाउंट डेफिसिट; क्रूड में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से सीऐडी 30-40 बेसिस पॉइंट बढ़ता है।
- रुपया : डॉलर मजबूत होने से रुपये पर दबाव बढ़ेगा।
- जीडीपी : एक्सपर्ट्स का कहना है कि 50 डॉलर की बढ़ोतरी से जीडीपी को 2% तक का झटका लग सकता है।
 
एच एस बी सी की चीफ इकोनॉमिस्ट प्रांजल भंडारी के मुताबिक अगर कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहीं तो पेट्रोल डीजल के दाम में 10 से 12 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हो सकती है।

रूस और अमेरिका से इम्पोर्ट
अप्रैल में रूस से तेल का प्रीमियम 425% बढ़ गया, फिर भी भारत ने रूस से खरीद बढ़ाई। वहीं अमेरिका से तेल की हिस्सेदारी घटकर 2.9% रह गई।
 
 
सरकार क्या कर रही है?
सरकार ने तेल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है और औ ऍम सी एस का बोझ अपने ऊपर लिया है। लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि कुछ बोझ कंस्यूमर को भी उठाना पड़ सकता है।
 
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं। इंपोर्ट बिल बढ़ने से इन्फ्लेशन , ट्रेड डेफिसिट और रुपया तीनों पर दबाव है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पश्चिम एशिया का संकट कितना लंबा चलता है।
 

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