राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 34 साल बाद आमूल-चूल परिवर्तन लागू
संवाददाता/in24 न्यूज़.
शिक्षा से ही समाज और दुनिया के बारे में शिक्षित हुआ जा सकता है. एक लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रिय शिक्षा नीति में आमूल-चूल परिवर्तन किया गया है. केंद्र की मोदी सरकार ने भारत में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को बड़े बदलाव के साथ मंजूरी दे दी है। भाजपा सरकार में बहुप्रतीक्षित इस शिक्षा नीति पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से देश की स्कूल और उच्चशिक्षा प्रणाली में बड़ा परिवर्तनकारी सुधार आएगा। मोदी कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने मीडिया से कहा कि भारत में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपनी तरह की सबसे बड़े परामर्श और चर्चा प्रक्रिया का परिणाम है। उन्होंने बताया कि इसके मसौदे को विचार-विमर्श के लिए सार्वजनिक पटल पर रखे जाने के बाद 2.25 लाख सुझाव मिले थे। एचआरडी मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस शिक्षा नीति को लागू किए जाने के बाद भारत दुनिया में ज्ञान के एक महान केंद्र और शिक्षा गंतव्य के रूप में उभरेगा। नई शिक्षा नीति में मानव संसाधन विकास मंत्रालय अब शिक्षा मंत्रालय कहलाएगा। मानव संसाधन विकास मंत्री ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बदलाव और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शिक्षा नीति नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। उन्होंने छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और हितधारकों को इसके लिए बधाई दी और कहा कि यह देश के लिए ऐतिहासिक पल है। उन्होंने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पूरे भारत में बच्चों की उच्च गुणवत्ता वाली प्रारंभिक देखभाल और शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करेगी। उन्होंने कहा कि हम सामाजिक क्षमताओं, संवेदनशीलता, अच्छे व्यवहार, नैतिकता, टीमवर्क और बच्चों के बीच सहयोग पर ध्यान केंद्रित करेंगे। उन्होंने कहा कि यह 21वीं शताब्दी की पहली शिक्षा नीति है, जिसने चौंतीस साल पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 का स्थान लिया है। रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि पहुंच, निष्पक्षता, गुणवत्ता, वहनीय और जवाबदेही के मूलभूत आधारों पर निर्मित नई शिक्षा नीति सतत विकास के एजेंडा 2030 से जुड़ी हुई है और इसका उद्देश्य स्कूल-कॉलेज शिक्षा को अधिक समग्र बनाकर भारत को एक जीवंत ज्ञान वाले समाज और वैश्विक ज्ञान महाशक्ति में बदलना है। एचआरडी मंत्री के मुताबिक़ नई शिक्षा नीति 21वीं सदी की जरूरतों के अनुकूल, लचीला, बहुविषयक और प्रत्येक छात्र की अद्वितीय क्षमताओं को सामने लाएगी। ग़ौबता दें कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1986 में शिक्षा नीति लागू की थी, इसके बाद 1992 में इसमें कुछ संशोधन किए गए थे, अब 34 साल बाद इसे बदल दिया गया है। इसरो के भूतपूर्व अध्यक्ष वैज्ञानिक और पद्म विभूषण डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में जून 2017 में गठित विशेषज्ञों की समिति ने नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार किया था, जो 31 मई 2019 को मानव संसाधन विकास मंत्री को प्रस्तुत किया था, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने बुधवार को मंज़ूरी दी है। नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं। भारतीय संविधान के चौथे भाग में उल्लेखित नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि प्राथमिक स्तर तक के सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाए। इस तरह वर्ष 1948 में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही भारत में शिक्षा प्रणाली को व्यवस्थित करने का काम शुरू हुआ था। भारतीय शिक्षा नीति के अतीत पर दृष्टि डालें तो लक्ष्मण स्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में 1952 में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग, तथा 1964 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में गठित शिक्षा आयोग की अनुशंशाओं के आधार पर 1968 में शिक्षा नीति पर एक प्रस्ताव प्रकाशित किया गया था, जिसमें राष्ट्रीय विकास के प्रति वचनबद्ध, चरित्रवान तथा कार्यकुशल युवक युवतियों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया। इसपर कार्य करते हुए मई 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू कर दी गई। जो अभी तक चलती रही है। इस दौरान भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा के लिए 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति और 1993 में प्रोफेसर यशपाल समिति का गठन किया गया था। भारत की शिक्षा नीति अनेक बार विवादों में आई है और अध्ययनों में यह पाया गया है कि शिक्षा नीति कई प्रमुख बिंदुओं पर विफल एवं दोषपूर्ण है, जिसमें प्राइमरी शिक्षा प्रमुख तत्व है, जो किसी भी देश के संस्कार और चरित्र निर्माण की नींव है, जो मुख्यतः पराए हाथों में है और जिसकी घोर उपेक्षा होती आ रही है, यही कारण है कि आज भी सबसे बड़ा संकट प्राइमरी शिक्षा पर व्याप्त है। उम्मीद की जाती है कि मोदी सरकार की इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस संकट का समाधान हो सकेगा। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर विशेष टिप्पणी की है। इसका स्वागत करते हुए उन्होंने इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास में एक वास्तविक असाधारण दिन बताया है। एक ट्वीट संदेश में अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 21वीं शताब्दी के लिए नई शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दी है, यह नीति स्कूल और उच्चशिक्षा दोनों में आवश्यक ऐतिहासिक सुधार लाएगी। बता दें कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किये गए बदलाव से शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है.