केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव लड़ना उमर अब्दुल्ला को मंज़ूर नहीं
संवाददाता/in24 न्यूज़.
उमर अब्दुल्ला ने एक समाचार पत्र में अपने लिखे लेख में साफ किया है कि वे केंद्र शासित प्रदेश से चुनाव लड़ना नहीं चाहते। बता दें कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला का कहना है कि वह तब तक विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे जब तक कि जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बना रहेगा. उमर अब्दुल्ला को कुछ समय पहले हिरासत से रिहा किया गया था, उन्हें आठ महीने नजरबंद रखा गया. एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित एक ओपिनियन पीस में उमर अब्दुल्ला ने लिखा है कि वह जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि राज्य को अपमानित किया गया है.उन्होंने लिखा कि मेरे लिए मैं बहुत स्पष्ट हूं कि जब तक जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश रहेगा, मैं कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा. देश में सबसे अधिक अधिकार प्राप्त विधानसभा का सदस्य रहा हूं और वह भी छह साल तक विधानसभा के नेता के रूप में, मैं बस उस सदन का सदस्य नहीं बन सकता जिसने हमें बेघर कर दिया. अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 270 हटाने का विरोध किया है.उमर अब्दुल्ला ने लिखा ''आज तक मैं राज्य के लोगों को दंडित और अपमानित करने के अलावा इस कदम की आवश्यकता को समझने में विफल रहा. यदि लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने का कारण क्षेत्र की बौद्ध आबादी के बीच सार्वजनिक मांग है, तो जम्मू के लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग अधिक पुरानी मांग है. यदि धार्मिक आधार पर मांग को स्वीकार किया गया था, तो इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया कि लेह और कारगिल जिले मुस्लिम बहुल हैं और कारगिल के लोग जम्मू-कश्मीर से अलग होने का विरोध कर रहे हैं. अब्दुल्ला ने लिखा कि अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से सही ठहराने के लिए कई कारण दिए गए. यह आरोप लगाया गया था कि धारा 370 ने अलगाववाद को हवा दी है और कश्मीर में आतंकवादी हिंसा को पनपने दिया है. अगर ऐसा है, तो ऐसा क्यों है कि लगभग एक साल बाद उसी केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट को यह बताने के लिए मजबूर होना पड़ा कि जम्मू-कश्मीर में हिंसा बढ़ रही है? कहा गया कि अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर के लोगों को गरीबी में रखा. गरीबी के आंकड़ों पर एक सरसरी निगाह डालने से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर में देश में गरीबी का स्तर सबसे कम है. विशेष दर्जा हटाना दशकों से भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा था इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि केंद्र ने जम्मू-कश्मीर को "अपमानित" किया और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया. गौरतलब है कि घाटी से धारा 370 के हटाए जाने के बाद से अब्दुल्ला परिवार केंद्र सरकार से नाराज़ चल रहा है.