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पति के जेल में होने से मां बनने के लिए अदालत पहुंची पत्नी

09 Apr, 2022 648

संवाददाता/in24 न्यूज़.  
हर औरत मां बनने का सपना देखती है, पर कई बार परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि मां बनने की फ़रियाद अदालत तक पहुंच जाती है। सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी की पत्नी ने राजस्थान हाई कोर्ट में गर्भधारण करने को लेकर याचिका दायर की थी। कैदी की पत्नी ने हाई कोर्ट से अपने पति को 15 दिन की पैरोल पर रिहा करने की मांग करते हुए याचिका दायर की। इस बीच हाई कोर्ट ने महिला की याचिका को स्वीकार कर जेल में बंद कैदी को सशर्त पैरोल पर रिहा करने का आदेश जारी कर दिया। हालांकि आरोपी करीब 11 महीने पहले ही 20 दिन की पैरोल से लौटा था। दरअसल, भीलवाड़ा जिले के रबारियों की ढाणी का रहने वाला नंदलाल 6 फरवरी 2019 से अजमेर जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है। सजा मिलने से कुछ समय पहले ही उसकी शादी हुई थी। लेकिन अपराध के मामले के चलते उसे जेल हो गई। उसके बाद पहली बार उसे पिछले साल मई में 20 दिन की पैरोल दी गई। इस बीच कोरोना और अन्य कारणों के चलते करीब दो साल तक पत्नी और परिवार से नंदलाल की मुलाकात संभव नहीं हो सकी। इस बीच नंदलाल की पत्नी कुछ दिन पहले जेल अफसरों के पास वकील के साथ पहुंची और कहा- वह मां बनना चाहती है, अगर पति को कुछ दिन की पैरोल पर छोड़ दें तो उसका यह अधिकार पूरा हो सकता है। जेल अफसरों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब जेल अफसरों की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो वो कलेक्टर के पास पहुंची और अपना प्रार्थना पत्र दिया। कलेक्टर ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। जब पत्नी का सब्र जवाब दे गया तो वह सीधे हाईकोर्ट जा पहुंची और जज के सामने अपना पक्ष रखा। पत्नी ने कहा कि पति से अपराध हुआ है, लेकिन उनकी मंशा नहीं थी। जेल और पुलिस के तमाम नियमों का वे सख्ती से पालन कर रहे हैं। प्रोफेशनल अपराधी वे नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि पैरोल में इस तरह की कंडीशन के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं, लेकिन हाईकोर्ट में जज संदीप मेहता और फरजंद अली की खंडपीठ ने इस मामले को सुना और कहा कि पैरोल में संतान उत्पत्ति के लिए वैसे तो कोई साफ नियम नहीं हैं। लेकिन वंश के संरक्षण के उद्देश्य से संतान होने को धार्मिक दर्शन भारतीय संस्कृति और विभिन्न न्यायिक घोषणाओं के माध्यम से मान्यता दी। जजों ने ऋग्वेद व वैदिक भजनों का उदाहरण दिया और संतान उत्पत्ति को मौलिक अधिकार भी बताया। कोर्ट ने पक्ष सुनने के बाद कहा कि दंपत्ति को अपनी शादी के बाद से आज तक कोई समस्या नहीं है। हिन्दू दर्शन के अनुसार गर्भधारण करना 16 संस्कारों में सबसे ऊपर है, इस कारण अनुमति दी जा सकती है। बता दें कि यह अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है।

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