मजदूर दिवस पर बेहाल हैं मजदूर
संवाददाता/in24 न्यूज़.
लॉकडाउन की वजह से आज पूरी दुनिया के लिए मजदूर दिवस मनाना नामुमकिन हो गया है. आज कोरोना वायरस और लॉकडाउन के मद्देनजर भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर के मजदूर मुश्किल में हैं। भारत के संदर्भ में बात करें तो नब्बे फीसदी वर्क फोर्स असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। इनकी त्रासदी को हम मई दिवस के दिन याद कर लें तो काफी होगा। मई दिवस पर बंदी के दौरान लाखों मजदूरों की घर अपने गृह प्रदेश लौटने की जद्दोजहद ने नेताओं के पसीने बहा दिए हैं। मजदूरों को ये भी चिंता खाये जा रही है कि बंदी के बाद की स्थिति में कहीं उन्हें नौकरी से हाथ न धोना पड़े। फिलहाल जो दूसरे राज्यों में प्रवासी मजदूर के तौर पर फंसे हुए हैं उन्हें खाने पीने के लाले पड़ रहे हैं। कइयों ने तो पैदल ही हजारों की किलोमीटर तक का सफर तय कर घर पहुंचने की जुगत लगा ली। एसी कमरों में बैठने वाले नेताओं और अफसरों को शायद अंदाजा भी नहीं होगा कि छोटे छोटे बच्चों के साथ सैंकड़ो किलोमीटर पैदल चलना कितना मुश्किल भरा काम है। ऐसे ही प्रवासी मजदूर सुकलाल यादव हैं, जो बड़ी कमाई का सपना लेकर दिल्ली आए थे। हालांकि यहां इन्हें पेट पालने के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ। रोज खा-पीकर तीन-चार सौ रुपये बचाते थे। लॉकडाउन की हालत में तो उस कमाई पर भी ताला पड़ गया। बिहार के जक्कनपुर थाने में प्रीति देवी गुहार लेकर पहुंचीं कि पति मजदूरी करता था। घर में राशन और नकदी खत्म है। बताएं कहां से खिलाएं बच्चों को। अब भला थाने के पुलिसकर्मियों के पास क्या जवाब होगा? तत्काल पीछा छुड़ाने के लिए पॉकेट से कुछ दे दिया। लेकिन क्या जिंदगी चलाने के लिए चंद नोटों की पत्तियां काफी है। आज देशभर में दिहाड़ी मजदूरों को खाना खिलाने और राशन दिलाने के नाम पर दाता फोटो खींच रहे हैं। साथ ही इसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर खुद की वाह वाही लूटी जा रही है। मजदूर दिवस का ये दिन मजदूरों के अधिकार के साथ ही उनकी गरिमा की भी बात करता है। मुश्किल वक्त में अगर मजदूरों की मदद की जा रही है तो कोई दरकार नहीं कि इसका ढिंढोरा पीटा जाए. मजदूरों में बड़े बड़े पुल-पुलिया और भवन निर्माण की ताकत है तो वे दो रोटी का जुगाड़ भी जरूर कर सकते हैं.