महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन
संवाददाता/in24 न्यूज़.
तमाम राजनीतिक उठापटक के बाद महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग चुका है. महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी गई है. दिन में महाराष्ट्र के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी जिसमें यह कहा गया कि फ़िलहाल संविधान के हिसाब से सरकार बनना असंभव है. ऐसे में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए. केंद्र सरकार ने आनन-फानन में कैबिनेट बैठक बुलाकर गवर्नर की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला कर लिया. ऐसे में सवाल यह है कि क्या राज्यपाल ने निष्पक्ष भूमिका निभाई? या वह केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे थे? क्या सभी दलों के साथ वह समान ढंग से पेश आ रहे थे? राज्य में किसी भी पार्टी को बहुमत का आँकड़ा नहीं मिलने के बाद सत्ता स्थापित करने का खेल पिछले 20 दिनों से चल रहा था. महाराष्ट्र में किसी भी पार्टी को बहुमत का आंकड़ा नहीं मिलने के बॉस सत्ता स्थापित करने का खेल पिछले 20 दिनों से चल रहा है. और ऐसे में सबकी नजरें राज्यपाल पर टिकी हुई हैं. राज्यपालों की भूमिका हमारे देश में उस समय से ही संदेह के घेरों में आने लगी हैं जब से इन पदों का राजनीतिकरण होने लगा है यानी इन पदों पर सत्ताधारी दल अपने पार्टी के रिटायर्ड होने वाले नेताओं को बिठाने लगी है. जिस -जिस प्रदेश में सत्ता का समीकरण अपूर्ण बहुमत के साथ उलझने लगता है वंहा यह सवाल खड़े होने लगता है की क्या राज्यपाल निष्पक्ष भूमिका निभायेंगें ? महाराष्ट्र में भी वही हो रहा है और राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठने का दौर शुरु हो गया है. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने छात्र राजनीति और संघ से जुड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुवात की थी और वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद पर पंहुचे थे और अब महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. राज्य के चुनाव परिणाम 24 अक्टूबर को घोषित हो चुके थे और साथ साथ मिलकर चुनाव लड़ी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को बहुमत का आंकड़ा मिला था. लेकिन परिणामों के बाद भाजपा -शिवसेना के रिश्ते खराब हो गए और सत्ता बनाने को लेकर यह स्थिति उत्पन्न हो गयी. दरअसल अब यह सवाल उठ रहा है की आज शिवसेना ने जब 48 घंटे का अतिरिक्त समय माँगा तो उसे दिया क्यों नहीं ? इसके लिए यह तर्क दिया जा रहा है की पहले तो सरकार का कार्यकाल खत्म होने का इंतज़ार किया जाता रहा और अब कुछ घंटों का अतिरिक्त समय नहीं देकर स्थिति को सहज बनाने की बजाय और अधिक उलझाया जा रहा है. इस बात को कोई भी नकार नहीं सकता है की सरकार को पूरा कार्यकाल 9 नवम्बर को खत्म होने तक भारतीय जनता पार्टी को राज्यपाल की तरफ से कोई निमंत्रण नहीं भेजा गया. देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद उन्हें फिर से सरकार बनाने का आमंत्रण दिया गया और 48 घंटे का समय दिया गया यह बताने के लिए की वे सरकार स्थापित करना चाहते हैं या नहीं ? समय सीमा समाप्त होने के कुछ घंटे पहले ही भाजपा नेता राज्यपाल से मिले और सरकार बनाने में असमर्थता जता दी तो नंबर शिवसेना का आया. शिवसेना को 24 घंटे का समय दिया गया और समय सीमा समाप्त होने के एक घंटे पहले शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में राज्यपाल से मिले और इस बात की इच्छा जताई की उनकी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस से गठबंधन कर सरकार बनाने की इच्छुक है. शिवसेना अपने साथ कुछ निर्दलीय विधायकों को भी ले गयी थी. उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल से अनुरोध किया था कि वे उन्हें अतिरिक्त समय दें ताकि वे पूर्ण बहुमत के आंकड़े को साथ लेकर उपस्थित हों. लेकिन राज्यपाल ने शिवसेना की इस अपील को स्वीकार नहीं किया और राष्ट्रवादी कांग्रेस को सरकार बनाने का निमंत्रण भेज दिया. राज्यपाल के इस रुख पर क़ानून विशेषज्ञों की अलग -अलग राय हो सकती है लेकिन एक बात जो है वह यह है की राज्यपाल की भूमिका राज्य में सरकार बनाने की ज्यादा होती है ना की राष्ट्रपति शासन की पहल करने या विधानसभा को भंग करने की. यदि राज्य में पहले चरण में सभी विकल्पों को मौका देने के बाद भी सरकार ना बने तो राज्यपाल नव निर्वाचित विधानसभा के कार्यकाल को स्थगित करते हैं और राष्ट्रपति शासन लागू भी कर देते हैं तो उसके बाद भी भाजपा -शिवसेना या कोई और गठबंधन अपनी संख्या बल दिखाकर फिर से सरकार बनाने की पहल कर सकता है! बहुत से कानूनविद इस बात को कह रहे हैं कि भाजपा ने तो सरकार बनाने से ही इंकार कर दिया है जबकि शिवसेना ने सहयोगी दलों से चर्चा और कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को तय करने के लिए 48 घंटों का अतिरिक्त समय ही माँगा था जो उसे दे दिया जाना चाहिए था. इनका कहना है जब चुनाव परिणाम से लेकर विधानसभा के कार्यकाल के समाप्त होने का इन्तजार किया जा सकता है तो कुछ और अतिरिक्त घंटे देने में क्या हर्ज थी! कानूनविदों का यह मानना है कि चूंकि शिवसेना ने सरकार बनाने की इच्छा राज्यपाल के समक्ष जताई है इसलिए उसका दावा अदालत के समक्ष खड़ा रह सकता है और उसे इस मामले में राहत भी मिल सकती है. लेकिन राज्यपाल ने राष्ट्रवादी कांग्रेस को आमंत्रण दे दिया है और उसने भी असमर्थता जताई तो वे कांग्रेस को निमंत्रित कर सकते हैं. इन दोनों पार्टियों को भी राज्यपाल 24 -24 घंटे का समय देने वाले हैं. राज्यपाल के इस निर्णय को लेकर कई शंकाएं और सवाल लोगों के उठ रहे हैं. यह आशंका जताई जा रही है कि क्या राज्यपाल यदि सभी दलों ने सरकार गठन से इनकार कर दिया हो, तब राज्यपाल राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज कर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर देंगें ? अगर राज्यपाल को लगता है कि राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद भी कोई पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है तो वह राज्य में मध्यावधि चुनाव की सलाह दे सकते हैं. राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद राज्य की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास सुरक्षित हो जाती हैं. विधानसभा का कार्य संसद करती है. इसके लिए दो महीने के भीतर संसद की मंजूरी जरूरी है. राज्य में 6 महीने या ज्यादा से ज्यादा 1 साल के लिए राष्ट्रपति शासन लागू रह सकता है. यदि एक साल से अधिक राष्ट्रपति शासन को आगे बढ़ाना है, तो इसके लिए केंद्रीय चुनाव आयोग से अनुमति लेनी होगी. ऐसे में एक साल के बाद फिर से चुनाव की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता. अगर राज्यपाल के न्योते को ठुकराकर कांग्रेस और एनसीपी दोनों सरकार गठन से इनकार करते हैं तो राज्य में राष्ट्रपति शासन का रास्ता साफ हो जाएगा. लेकिन आने वाले दिनों में अगर कांग्रेस शिवसेना का समर्थन करने के लिए आगे आती है तो एनसीपी के सहयोग से उद्धव ठाकरे राज्यपाल से बहुमत का दावा कर सकते हैं. ऐसे में कांग्रेस-एनसीपी की मदद से शिवसेना सरकार बना सकती है. सियासी जानकार अभी बीजेपी के सरकार बनाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं. हालांकि अभी बीजेपी ने सरकार गठन को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं लेकिन किसी और पार्टी की मदद से बीजेपी एक बार फिर सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के पास पहुंच सकती है. इन परिस्थितियों में सारे निर्णय राज्यपाल के स्व विवेक पर आधारित होते हैं और हमारे देश में इस बात के ढेरों उदाहरण हैं की ये निर्णय राजनीति को कितने प्रभावित करते रहे हैं. हमारे देश में राज्यपालों के असंवैधानिक फैसलों का शिकार अधिकांश राज्य रहे हैं. कर्नाटक इसका केंद्र रहा है. कर्नाटक में 1983 में पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी और रामकृष्ण हेगड़े मुख्यमंत्री बने. उनके बाद अगस्त, 1988 में एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने 21 अप्रैल, 1989 को नैतिकता के आधार पर बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया. राज्यपाल सुबैया ने कहा कि बोम्मई सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है. बोम्मई ने विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल से अनुमति मांगी, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया. बोम्मई ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक खंडपीठ ने एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में बहुचर्चित निर्णय दिया. इसमें संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश थे. इस निर्णय की बड़ी विशेषता यह है कि इसने अनुच्छेद 356 के प्रयोग को अदालतों द्वारा समीक्षा न कर सकने की परंपरा को उलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा- उन सभी मामलों में, जहां कुछ विधायकों द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने की बात हो, बहुमत के निर्धारण का उचित तरीका सदन में शक्ति परीक्षण है, न कि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत मत, भले ही वह राज्यपाल हो या राष्ट्रपति. बोम्मई फैसला भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अहम फैसला माना जाता है. ऐसी उम्मीद की गयी थी कि इस फैसले के बाद राज्यपालों के मनमाने रवैये पर लगाम लगेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसके बाद भी राज्यपालों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं. लेकिन अब देखना है की इन परिस्थितियों में महाराष्ट्र में क्या होने वाला है. भारतीय जनता पार्टी यंहा पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी सरकार बनाने में असमर्थ रही है. केंद्र में उसकी सरकार है ऐसे में क्या केंद्र का प्रदेश में आसानी से गैर भाजपाई सरकार बन पाएगी यह सबसे बड़ा सवाल है