तेहरान में महाविनाश, खामेनेई की मौत से भड़का ईरान
02 Mar, 2026
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मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच जारी टकराव अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए ईरान पर भीषण हमले किए जो तीसरे दिन भी जारी हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कई देशों में बने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं, जिससे पूरे मिडिल ईस्ट में टकराव बढ़ता जा रहा है।
दूसरी तरफ खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने भी अपने तेवर से बता दिया है कि वो रुकने वाला नहीं है। ईरान की जामकरान मस्जिद पर इंतकाम का लाल झंडा फहराया गया है। वहीं हालात ऐसे बन गए हैं कि कई देशों के दूतावास, सैन्य ठिकाने और समुद्री संपत्तियां सीधे निशाने पर आ गई हैं। मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच क्षेत्र में अस्थिरता तेजी से बढ़ रही है। ईरान ने जवाबी हमले में करारा जवाब देने का दावा करते हुए इजरायल और मिडिल ईस्ट में स्थित कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।
मिडिल ईस्ट के देशों ने अपने एयरस्पेस बंद कर दिए हैं, जबकि कई देशों ने अपने नागरिकों को एडवाइजरी जारी की है, जिसमें गैर-ज़रूरी मूवमेंट से बचने के लिए कहा गया है। कुवैत से लेकर बहरीन, साइप्रस, अबू धाबी और जॉर्डन तक सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है, जबकि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई का दावा किया। इजरायल-अमेरिका बनाम ईरान में छिड़ी इस जंग ने पूरे क्षेत्र में खौफनाक हालात पैदा कर दिए हैं।
अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद बौखलाए ईरान के पलटवार के चलते पूरा मिडिल ईस्ट युद्ध की चपेट में आ रहा है। दशकों से व्यापार और पर्यटन के वैश्विक केंद्र रहे दुबई और अबू धाबी जैसे शहर भी अब ईरान-इजरायल संघर्ष की जद में आ गए हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में इन आधुनिक शहरों के ऊपर उठता काला धुआं और जलते हुए तेल टैंकर इस बात के गवाह हैं कि युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। कुवैत स्थित अमेरिकी दूतावास परिसर में आग और धुएं की खबरें सामने आई हैं। इस हमले के पीछे ईरान का हाथ माना जा रहा है, जिससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। कुवैत में मिसाइल और ड्रोन हमलों के निरंतर खतरे के बीच अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों के लिए वर्ल्ड वाइड एडवाइजरी जारी की है। दूतावास कर्मियों और नागरिकों को घरों के सबसे निचले फ्लोर पर छिपने और खिड़कियों से दूर रहने को कहा गया है।
वहीं साइप्रस के राष्ट्रपति ने पुष्टि की है कि ब्रिटेन के 'अक्रोतिरी' एयरबेस पर ईरानी 'शाहेद' ड्रोन से हमला हुआ है। फ्रांसीसी रक्षा मंत्री के के मुताबिक अबू धाबी बंदरगाह पर स्थित उनके नौसेना बेस के हैंगर को ड्रोन हमले ने नुकसान पहुंचाया है। वहीं, बहरीन में 300 ब्रिटिश सैनिकों के बेहद करीब ईरानी मिसाइलें गिरी हैं। अमेरिकी तेल टैंकरों पर हमला और भारी हताहत ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया है कि उनके 7वें और 8वें वेव के हमलों में 3 अमेरिकी और ब्रिटिश तेल टैंकरों को निशाना बनाया गया है। साथ ही दावा है कि बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों पर हमले में सैकड़ों सैनिक हताहत हुए हैं।
वहीं कुवैत के एयरस्पेस में एक अमेरिकी एफ-15 जेट क्रैश हो गया है। पायलट सुरक्षित इजेक्ट कर गया, लेकिन चर्चा है कि ये हादसा कुवैत के अपने ही 'पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम' की गलत पहचान का नतीजा हो सकता है। ईरान ने बहरीन के मनामा में स्थित अमेरिकी नौसेना की शक्तिशाली 5वीं फ्लीट के मुख्यालय को निशाना बनाया है। इसके अलावा जॉर्डन में भी अमेरिकी ठिकानों पर भीषण मिसाइलें दागी गई हैं। वहीं रान के अंधाधुंध हमलों से नाराज होकर फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने एक साझा बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि वे ईरान के खिलाफ "रक्षात्मक कार्रवाई" के लिए तैयार हैं और ईरान को इन हमलों को तुरंत रोकने की चेतावनी दी है।
कुवैत और बहरीन में तैनात अमेरिकी नागरिकों को चेतावनी दी गई है कि मिसाइल इंटरसेप्ट यानी हवा में नष्ट होने के बाद भी उसका गिरता हुआ मलबा जानलेवा हो सकता है। लोगों को बाहरी दीवारों और खिड़कियों से दूर रहने की सलाह दी गई है। वहीं अमेरिका, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की कड़ी निंदा की है। इन सात देशों ने मिडिल ईस्ट में ईरान की सैन्य कार्रवाइयों को क्षेत्र की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बताया है। इन देशों ने अपनी संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। ये देश एकजुट होकर अपने नागरिकों की रक्षा करने और आत्मरक्षा के अपने अधिकार को दोहराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
कुल मिलाकर अब लड़ाई ईरान बनाम वर्ल्ड 11 के बीच होती जा रही है। अमेरिका ने साफतौर पर चेतावनी दी है कि आने वाले समय में हमला और भी घातक होगा। युद्ध के फ़िलहाल ख़त्म के होने कोई आसार नहीं है। वहीं आज सबके मन में सवाल होगा कि आखिर क्यों ईरान पर हमला करना पड़ा और उसके सुप्रीम लीडर को मारने की प्लानिंग कैसे हुई, तो आपको बता दें कि अमेरिका-इजरायल की ओर से शनिवार को हुए इस हमले की नींव दिसंबर के आखिर में पड़ी, जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मार-ए-लागो में ट्रंप से मुलाकात की। उस समय ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू ही हुए थे। नेतन्याहू ने पिछली संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद अगली रणनीति पर चर्चा की, जो मुख्य रूप से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता पर केंद्रित थी और मई के आसपास की योजना थी। लेकिन कुछ ही दिनों में हालात बदल गए।
ईरानी सरकार ने सख्ती से प्रदर्शन दबा दिए और हजारों लोगों के मारे जाने की खबरें आईं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मदद पहुंचने वाली है और प्रदर्शनकारियों से सरकारी संस्थाओं पर कब्जा करने की अपील की। 14 जनवरी को ट्रंप हमले का आदेश देने ही वाले थे, लेकिन उन्होंने कदम पीछे खींच लिया। इसके बजाय उन्होंने मिडिल ईस्ट में बड़ी सैन्य तैनाती की और इजरायल के साथ एक संयुक्त ऑपरेशन की गुप्त योजना बनानी शुरू की। आने वाले हफ्तों में मोसाद प्रमुख, इजरायली सैन्य खुफिया प्रमुख और आईडीएफ चीफ ऑफ स्टाफ वाशिंगटन गए। वहीं ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और ऑपरेशन रोअरिंग लायन की रूपरेखा तैयार की गई. इसी दौरान ट्रंप ने यह भी परखा कि क्या सैन्य दबाव के जरिए ईरान से उनकी शर्तों पर समझौता कराया जा सकता है।
फरवरी की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में मुलाकात हुई। कुछ दिन बाद नेतन्याहू वाशिंगटन पहुंचे ताकि बातचीत और संभावित संयुक्त हमले पर चर्चा हो सके। ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ को शुरुआत से ही समझौते की संभावना कम लग रही थी, लेकिन उन्होंने बातचीत जारी रखी। ईरान को साफ बता दिया गया था कि अगर जल्दी ठोस प्रगति नहीं हुई तो सैन्य कार्रवाई होगी। जिनेवा बैठक से एक हफ्ते पहले अमेरिका और इजरायल ने हमले की संभावित तारीख तय कर ली थी। वही शनिवार, जब खामेनेई अपने सरकारी परिसर में नियमित बैठक करते थे। चुनौती यह थी कि उन्हें शक न हो और वे अंडरग्राउंड बंकर में न चले जाएं। एक इजरायली खुफिया अधिकारी के मुताबिक, मीडिया में खामेनेई की हत्या की संभावना वाली खबर से कुछ चिंता जरूर हुई, लेकिन उन्होंने अपनी योजना नहीं बदली। गुरुवार को कुशनर और विटकॉफ जिनेवा पहुंचे। उन्हें पहले से अंदेशा था कि समझौता मुश्किल है, लेकिन उन्होंने बैठक की ताकि ईरान को लगे कि कूटनीति जारी है।
दरअसल बातचीत का नियम है कि जल्दी समझ आ जाना चाहिए कि समझौता संभव है या नहीं। बैठक में ईरान अमेरिकी रुख के करीब भी नहीं आया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक तीन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी। पहला न्यूक्लियर प्रोग्राम, दूसरा बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, और तीसरा क्षेत्रीय गुटों को फंडिंग, दरअसल अमेरिका ने ईरान को नागरिक परमाणु कार्यक्रम के लिए मुफ्त ईंधन देने का प्रस्ताव दिया, बशर्ते वह यूरेनियम संवर्धन छोड़े, लेकिन ईरान ने इनकार कर दिया। ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमता पर चर्चा से मना कर दिया। वहीं ईरान ने क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों को मिलने वाली मदद पर भी बात नहीं की। वहीं अमेरिका को खुफिया रिपोर्ट से संकेत मिला कि ईरान कथित रूप से नष्ट की गई परमाणु सुविधाओं को फिर से बना रहा था। जब अमेरिकी टीम ने ठोस प्रस्ताव मांगा, तो ईरान ने सात पन्नों का दस्तावेज दिया, जिसमें संवर्धन की जरूरत बताई गई थी।
अमेरिका ने इसे 2015 के समझौते से भी ज्यादा क्षमता वाला बताया। वहीं जिनेवा के बाद ओमान के विदेश मंत्री वाशिंगटन पहुंचे और आखिरी कोशिश की, लेकिन तब तक ट्रंप फैसला कर चुके थे। जब शुक्रवार को एक अरब अधिकारी ने विटकॉफ से पूछा कि क्या कोई हमला संभव है, तो उन्होंने सवाल को टाल दिया। वहीं शनिवार सुबह खामेनेई ने अपने सहयोगियों की बैठक बुलाई, जैसा अनुमान था। उसी समय तेहरान में दो अन्य सुरक्षा बैठकों भी चल रही थीं। कुछ ही मिनटों बाद तीनों जगहों पर एक साथ हमले हुए। अगर ईरान जिनेवा में ट्रंप की शर्तें मान लेता, तो हमला टल सकता था। लेकिन उन्हें लगा कि ट्रंप कार्रवाई नहीं करेंगे लेकिन वे गलत साबित हुए। यूएस सेंट्रल कमांड के मुताबिक ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने वाले ऑपरेशन की शुरुआत से लेकर अब तक अमेरिकी सेना ने ईरान के 1,000 से अधिक ठिकानों पर हमले किए हैं। वहीं इजरायल की तरफ से भी तेहरान में बमबारी जारी है। कुल मिलाकर ये लड़ाई मिडिल लिस्ट को भारी संकट में डाल दिया है। बहरहाल समंदर धधक रहा है, ईरान के शहर जलकर ख़ाक हो चुके हैं और सेना के बेस तबाह हो गए हैं। और अब देखना ये होगा कि युद्ध की आग और कितना जलाती है।