शिवसेना ने यूपीए और उसके सहयोगियों पर बोला जमकर हमला
संवाददाता/in24 न्यूज़.
अपनी अलग शैली के लिए जानेवाली शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। सामना ने यूपीए और उसके सहयोगियों पर जमकर हमला बोला है।किसान आंदोलन को लेकर विपक्षी दलों के एकजुट न होने को लेकर भी सामना में उनकी आलोचना की गई। साथ ही अपने संपादकीय के जरिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया शरद पवार को यूपीए गठबंधन की कमान सौंपने की पैरवी की है। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई है। वहीं फिलहाल यूपीए गठबंधन की कमान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में है। ये देखने की बात होगी कि शिवसेना के यूपीए नेतृत्व के सवाल से महाराष्ट्र में महाविकास अघाडी सरकार पर असर पड़ता है या नहीं। शिवसेना के संपादकीय में बीजेपी के विरोध करने के लिए विपक्षी दलों को एकजुट होने की सलाह दी गई है। लिखा गया है कि बीजेपी का विरोध करने के लिए जब तक यूपीए के सभी दल शामिल नहीं होंगे, तब तक विपक्ष सरकार के आगे बेअसर नजर आएगा। इसके साथ ही शिवसेना का कहना है कि बीजेपी की सत्ता में कांग्रेस नेताओं को अपना किया जा रहा है और बीजेपी महाराष्ट्र सरकार को काम करने से रोक रही है। शिवसेना ने कहा, प्रियंका गांधी को दिल्ली की सड़क पर हिरासत में लिया गया, राहुल गांधी का मजाक उड़ाया गया, यहां महाराष्ट्र में सरकार को काम करने से रोका जा रहा है, ये पूरी तरह लोकतंत्र के खिलाफ है। शिवसेना का कहना है कि केंद्र में काबिज बीजेपी सरकार को किसान आंदोलन की फिक्र नहीं कर है। सरकार के इस रवैया का कारण कमजोर विपक्ष है। शिवसेना ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए का कि मौजूदा विपक्ष पूरी तरह बेजान है, विपक्षियों की हालत बंजर गांव के मुखिया का पद संभालने जैसी है। विपक्ष की इस हालत के लिए पीएम मोदी या अमित शाह जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि विपक्ष खुद जिम्मेदार है और आगे आकर विपक्ष को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। गठबंधन की कमान संभाल रही कांग्रेस पर सवाल उठाते हुए शिवसेना ने संपादकीय में यूपीए को एक एनजीओ बताया है। सामना ने लिखा है कि यूपीए नाम के एक राजनीतिक संगठन की कमान कांग्रेस के नेतृत्व में है। यूपीए वर्तमान में एक एनजीओ की तरह लग रहा है, यही वजह है कि इस गठबंधन में शामिल पार्टियां किसान आंदोलन को लेकर बेफिक्र हैं। एनसीपी के अलावा इस गठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी ने मुखर होकर आवाज नहीं उठाई है। इसके साथ ही शिवसेना ने सामना में शरद पवार की वकालत भी की है। लिखा है कि राष्ट्रीय स्तर पर शरद पवार का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग है। उनके राजनीतिक अनुभव का फायदा प्रधानमंत्री से लेकर बाकी पार्टियां लेती हैं। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अकेले ही केंद्र सरकार से लड़ रही हैं। सत्ता के जोर के जरिए केंद्र सरकार ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को तोड़ने की कोशिश कर रही है। संपादकीय के जरिए कहा गया कि ऐसे वक्त में सभी विपक्षी दलों को चाहिए कि वे ममता को अपना समर्थन दें। लेकिन मुसीबत की इस घड़ी में ममता लगातार शरद पवार से संपर्क में हैं। कुछ हलकों में कहा गया है कि शरद पवार बंगाल जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को आगे आने की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस की स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि पार्टी के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष तक नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर सामना में लिखा गया है कि राहुल गांधी के काम के बावजूद कहीं कुछ कमी है। संपादकीय में कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के चुनाव पर भी सवाल खड़ा किया गया है। इसमें कहा गया है कि सोनिया गांधी कांग्रेस और यूपीए दोनों की अध्यक्ष हैं। अभी तक उन्होंने यूपीए अध्यक्ष की जिम्मेदारी को बखूबी संभाला है। लेकिन उनकी मदद के लिए मोतीलाल वोरा और अहमद पटेल हुआ करते थे, जो अब नहीं हैं। कांग्रेस के अगले अध्यक्ष और यूपीए के भविष्य को लेकर भ्रम बरकरार है। राहुल सरकार को घेरने का काम कर रहे, लेकिन कहीं कुछ कमी है।राहुल गांधी को लेकर संपादकीय में कहा गया है कि राहुल गांधी व्यक्तिगत तौर पर सरकार पर दबाव बनाने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं, लेकिन कहीं ना कहीं कुछ कमी है। टीएमसी, शिवसेना, अकाली दल, बीएसपी, जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक कृषि कानूनों को लेकर बीजेपी का विरोध कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए में ये लोग शामिल नहीं हैं। ऐसे में इन पार्टियों का यूपीए में शामिल हुए बिना सरकार को घेरने का प्रयास नाकामयाब रहने वाला है। अब देखना होगा कि सामना में लिखे संपादकीय से कांग्रेस पर कितना असर पड़ता है.