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उद्धव और राज ठाकरे ने गठबंधन का किया ऐलान, 20 साल बाद साथ आए ठाकरे ब्रदर्स

24 Dec, 2025 102

मुंबई और महराष्ट्र की सियासत के लिए बुधवार का दिन बेहद अहम और बड़ा रहा। दरअसल मुंबई में एक ऐसे सियासी गठबंधन का ऐलान हुआ। जिसका इंतजार पिछले कुछ महीनों से बेसर्बी से किया जा रहा था लेकिन शिवसैनिकों की तमन्ना 20 साल से थी जो अब पूरी हो गई है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना यूबीटी और राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एमएनएस ने बीएमसी समेत राज्य की कई अन्य महानगरपालिकाओं के चुनाव साथ लड़ने का ऐलान कर दिया है। 

महाराष्ट्र की सियासत का एक बड़ा मिलन हुआ है जिसने मनपा चुनाव से पहले नए सियासी समीकरण को जन्म दिया और इसे बड़ा टर्निंग पॉइंट भी माना जा रहा है। इतना ही नहीं 20 साल से इंतजार कर रहे ठाकरे परिवार के वफादार रहे कार्यकर्त्ता आज इस बात का जश्न मन रहे हैं कि दो भाइयों के बीच की दीवार अब टूट गई है  और ठाकरे ब्रदर्स एक साथ आ गए हैं। आपको बता दें कि राज ठाकरे ने अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से मतभेद के चलते शिवसेना छोड़ दी थी और एमएनएस बनाई थी। अब दो दशक बाद बुधवार को दोनों भाइयों ने 15 जनवरी को होने वाले नगर निगम चुनाव के लिए गठबंधन का ऐलान किया। 

वहीं अपने परिवारों के साथ मंच पर पहुंचे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का स्वागत करते हुए शिवसेना के सीनियर नेता संजय राउत ने इसे शुभ और ऐतिहासिक शुरुआत बताया। उन्होंने कहा कि शुभ शुरुआत है ताकि बीएमसी और अन्य नगर निगमों पर भगवा झंडा लहराता रहे। और ये सिर्फ ठाकरे भाइयों के जरिए ही संभव है। 

वहीं उद्धव ठाकरे ने गठबंधन का ऐलान करते हुए कहा कि हमारी सोच एक है। हमें मराठियों का संघर्ष, उनका बलिदान याद है। उन्होंने कहा कि आज हम दोनों भाई एक साथ हैं और हम एक साथ रहने के लिए साथ आए हैं। उद्धव ठाकरे ने कहा कि दिल्ली में बैठे लोग हमें तोड़ रहे हैं। इस बार हमें नहीं टूटना है। ऐसा हुआ, तो बलिदान का अपमान होगा। वहीं, राज ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र और मुंबई किसी भी झगड़े से बड़ा है इसलिए आज हम दोनों भाई साथ हैं।  उन्होंने कहा कि सीटों का बंटवारा मायने नहीं रखता। 

लेकिन मुंबई का मेयर मराठी ही होगा और हमारा ही होगा। आपको बता दें कि गठबंधन के ऐलान से पहले ठाकरे ब्रदर्स मुंबई के शिवाजी पार्क पहुंचे। इस दौरान उद्धव के साथ उनके बेटे आदित्य ठाकरे और राज ठाकरे के साथ उनके बेटे अमित ठाकरे भी थे। पूरा ठाकरे परिवार एक साथ शिवाजी पार्क पहुंचा और बालासाहेब ठाकरे को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। 

शिवसेना और मनसे के गठबंधन के ऐलान के मौके पर ठाकरे भाईयों ने जहां एकजुता दिखाई तो वहीं उनके परिवार के सदस्य भी मौजूद रहे। राज ठाकरे की पत्नी जहां आदित्य के पास खड़ी हुईं तो वहीं रश्मि ठाकरे ने अमित ठाकरे के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाई। इस मौके पर शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत भी दोनों भाईयों के साथ मौजूद रहे। 

दोनों भाईयों के मिलन पर उनके मामा चंद्रकांत वैद्य ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इतने सालों से, इतने लंबे समय से हम कोशिश कर रहे थे। आज हमारी कोशिशें रंग लाई हैं। आपको बता दें कि गठबंधन का ऐलान तो हो गया है लेकिन बीएमसी के साथ अन्य मनपा के चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे और फॉर्मूले पर अभी तक कोई ऐलान नहीं किया है। दोनों भाईयों ने कहा कि अभी भी कुछ सीटों को लेकर बात चीत चल रही है।

हालांकि ये स्पष्ट हो चुका है कि शिवसेना यूबीटी और मनसे बीएमसी के अलावा कल्याण-डोंबिवली ठाणे, मीरा-भाईंदर और नवी मुंबई समेत कई महानगरपालिकाओं के चुनाव साथ लड़ेंगे। दरअसल राज ठाकरे ने ये भी  स्पष्ट किया कि गठबंधन नासिक के लिए भी होगा। उन्होंने कहा कि आज की बैठक के बाद हम अन्य नगर निगमों के लिए भी घोषणा करेंगे।  वहीं शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत और मनसे नेता संदीप देशपांडे ने बताया कि सीटों के बंटवारे पर बातचीत पूरी हो चुकी है और कहीं भी दोनों दलों के बीच कोई मतभेद नहीं है। दोनों नेताओं ने कहा कि जल्द ही सींटों के बंटवारे से लेकर उम्मीदवारों के नामों पर फैसला कर लिया जाएगा। 

बीएमसी की यदि बात करें तो सूत्रों का कहना है कि कुल 227 सीटों में से  शिवसेना यूबीटी ने 150 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जबकि बाकी 77 सीटों पर राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना चुनाव लड़ेगी। उद्धव ठाकरे के करीबी नेताओं के अनुसार सीट बंटवारे की चर्चा में 150 से ज़्यादा सीटों पर बातचीत पूरी हो गई है, जबकि लगभग 70 सीटों पर अभी भी बात होनी बाकी है। दरअसल जिन सीटों पर विवादों था उनमे दादर, माहिम और परेल जैसे मराठी-बहुल इलाके हैं। जहां दोनों पार्टियों ने दावे किए हैं। लेकिन अगले कुछ दिनों में सीट बंटवारे का समाधान होने की उम्मीद जताई जा रही है।

कुल मिलाकर  बीजेपी को रोकने के लिए और अपना आखिरी सियासी दुर्ग को बचाए रखने के लिए उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे से हाथ मिला लिया है। जहां एक ओर उद्धव ठाकरे अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधे रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर राज ठाकरे के जिम्मे मराठी मतदाताओं को जोश दिलाने की भूमिका होगी। ठाकरे बंधु अपनी एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन करने के लिए मुंबई में संयुक्त रैलियां भी कर सकते है। इन रैलियों के जरिए ये संदेश देने की कोशिश होगी कि बीएमसी चुनाव में मुकाबला सीधा ठाकरे बनाम महायुति का है। दरअसल बीएमसी की सत्ता साढ़े तीन दशक से उद्धव ठाकरे की शिवसेना के हाथों है --- भले ही  महाराष्ट्र की सत्ता बदलती रही, लेकिन मुंबई की राजनीति पर उद्धव का कब्जा बरकरार रहा। 

1996 से लेकर 2022 तक शिवसेना यूबीटी का मेयर चुना जाता रहा है। जिसकी वजह ये रही कि शिवसेना की सियासत मुंबई से शुरू हुई और सियासी आधार भी यहीं पर है। जब  2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर बीजेपी के साथ गए तो मुंबई से बाहर के नेताओं का साथ मिला। लेकिन मुंबई के नेता और ज्यादातर विधायक उद्धव ठाकरे के साथ खड़े रहे। यानी मुंबई की सियासत पर उद्धव की पकड़ बनी रही, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना यूबीटी को झटका लगा। पार्टी महज सीटों पर सिमट कर रह गई। लिहाजा अब मुंबई की सियासत में उद्धव अपनी पकड़ बनाए रखना चाहेंगे क्यों यदि वे जीते, तो असली शिवसेना का दावा मजबूत होगा पर हारे, तो पार्टी का अंत निकट लगेगा। 

वहीं शिवसेना यूबीटी को बीएमसी की सत्ता से हटाकर ही असली चोट देने के फिराक में बीजेपी है। यानी उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी चुनाव जीतना केवल एक नगर निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व और विरासत की सबसे बड़ी लड़ाई है। करीब तीन दशकों तक बीएमसी पर अविभाजित शिवसेना का कब्जा रहा है, लेकिन 2022 के विभाजन के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। एकनाथ शिंदे की बगावत और चुनाव आयोग द्वारा उन्हें असली शिवसेना और धनुष-बाण का प्रतीक दिए जाने के बाद, उद्धव ठाकरे के लिए ये साबित करना जरूरी है कि जनता का समर्थन अभी भी ठाकरे परिवार के साथ है। 

वहीं बीएमसी का चुनाव जीतकर ये उद्धव ठाकरे संदेश देना चाहेंगे कि मुंबई का शिवसैनिक अभी भी मातोश्री के प्रति वफादार है। बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना को खड़ा किया, उसका शक्ति केंद्र हमेशा मुंबई रहा है। लेकिन उद्धव ठाकरे के  महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल होने के चलते शिवसेना के लोगों का मनोबल गिरा हुआ है। सत्ता अपने आप में एक अलग ऊर्जा और उत्साह देती है, जो बीजेपी के नेताओं में दिख भी रहा है। 

ऐसे में राज ठाकरे के साथ मिलकर उद्धव की तरफ से विरासत को बचाने की आखिरी कोशिश मानी जा रही है। उद्धव के लिए ये चुनाव ये दिखाने का मौका है कि विरासत केवल नाम या चुनाव चिह्न से नहीं, बल्कि जनसमर्थन से चलती है। उद्धव ठाकरे ने खुद इसे अपनी पार्टी के लिए अग्निपरीक्षा बताया है। महायुति की एकजुट घेराबंदी के बीच अगर वे बीएमसी बचा लेते हैं, तो ये 2029 के विधानसभा चुनावों के लिए उनकी बड़ी वापसी का आधार बनेगा। यही वजह है कि उद्धव ठाकरे ने पूरी ताकत बीएमसी के चुनाव पर लगा दी है। 
 

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