देशभर में नवरात्रि की धूम, मंदिरों में उमड़ा जनसैलाब
शारदीय नवरात्रि का पर्व हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस साल पर्व की शुरुआत सोमवार 22 सितंबर से हुई है। ये नौ दिन मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की आराधना को समर्पित होते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों की गई साधना से जातक को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि स्वयं मां दुर्गा इन दिनों पृथ्वी पर निवास करती हैं और भक्तों के दुख-संकट दूर करती हैं। भले ही देवी एक है लेकिन उसके रूप असंख्य हैं। कहीं शक्ति की पूजा है तो कहीं पूजा में शांति है, कहीं मंत्रों की गूंज हैं तो कहीं नृत्य और संगीत का शोर।
दरअसल हर परंपरा में सिर्फ और सिर्फ भक्ति और आस्था की झलकती है। यही विविधता उत्सव को अनोखा बनाती है। भारत में दुर्गा पूजा का उत्सव शुरू होता है तो ये सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं होता बल्कि महाउत्सव में बदल जाता है। कहीं भक्ति होती है, कहीं तंत्र की साधना तो कहीं भजन कीर्तन गूंजते हैं तो कहीं कुछ और परंपराए, पश्चिम बंगाल की गलियों से लेकर असम के कामाख्या मंदिर, उत्तर भारत के कन्या पूजा से लेकर मैसूर के राजमहल तक हर जगह इसके उत्सव रंग और कहानी बेहद अनोखी और अलग है।
मां दुर्गा शक्ति और असुरता के बीच संतुलन और बैभव और समृद्धि के वरदान का प्रतीक है। दरअसल मिट्टी से गढ़ा शरीर, रंगों से बनी आकृतियां और हाथों में अस्त्र शस्त्र लिए मां दुर्गा कुछ कहना चाहती है। भारत में जब दुर्गा पूजा शुरू होती है तो ये सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं होता बल्कि एक ऐसा उत्सव बन जाता है जिसमें रंग भी है शोर भी है, श्रद्धा भी और आध्यात्मिक रहस्य भी।
दरअसल कहीं पंडालो की रोशनी आसमान को छूती है तो कहीं प्राचीन मंदिरों में सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है। यदि हम बात करें असम के कामाख्या देवी मंदिर की तो यहां सीढ़ियों पर चढ़ते भक्तों की चेहरे पर आस्था के साथ-साथ रहस्य का साया भी दिखता है। क्योंकि वहां तंत्र अनुष्ठानों की परंपरा आज भी उतनी ही क्रूण है जितनी सदियों पहले हुआ करती है।
वहीं यदि हम उत्तर भारत की बात करें तो यहां कन्याओं को देवी मानकर पूजने की परंपरा है। दरअसल ये परंपरा श्रद्धा का प्रतीक तो है ही साथ ही शक्ति के आशीर्वाद की कामना भी है। वहीं सिंदूर खेला एक बंगाली परंपरा है जो दुर्गा पूजा के समापन पर मनाए जाने वाले उत्सव को कहते हैं, जिसमें विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर दुर्गा मां को विदाई देती हैं और एक-दूसरे के सुहाग की कामना करती हैं।
दरअसल जब महिलाएं सिंदूर माता को लगाने के बाद जब एक दूसरे को लगाती हैं तो ये तस्वीर बेहद अद्भुत होती है। ये सिर्फ आशीर्वाद की परंपरा नहीं है बल्कि सदियों पुरानी विरासत है। ये परंपरा पूर्वी और कुछ अन्य राज्यों में प्रचलित है, जहां इसे देवी महिषासुर को हराने के प्रति उनके हिंसक क्रोध को उत्तेजित करने के तरीके के रूप में देखा जाता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पूजा एक ही है लेकिन उसकी परंपराएं अनेक है। वहीं वैष्णव और शक्ति परंपरा भी अपनी अपनी पहचान के साथ इस उत्सव में झलकती है।
नवरात्रि में मंदिरों की खूबसूरती बढ़ाते फुल, ढोल नगाड़ों का शोर, पंडालो की चकाचौंध और देवी मां की भव्य मूर्तियां की शोभा देखते ही बनती है। मौजूदा वक्त में दुर्गा पूजा धार्मिक पर्व से कहीं आगे निकलकर अब आर्थिक और सामाजिक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। अब दुर्गा पूजा सिर्फ एक देवी की आराधना नहीं है। बल्कि ये अच्छाई की जीत, महिला शक्ति का उत्सव, समाज का मेल जोल, संस्कृति का रंग और इतिहास का आइना है।
जहां देश के दूसरे हिस्सों में मां दुर्गा की आराधना बली और हवन समेत कई अलग-अलग तरीके से होती है तो वहीं गुजरात में मां दुर्गा की पूजा गरबा और डांडिया से होती है। शाम ढलते ही मैदान पंडाल और सोसायटी रोशनी से जगमगा उठते हैं। महिलाएं पारंपरिक चनिया चोली पहनती हैं। जबकि पुरुष केडिया और धोती में सजते हैं और फिर गरबा का उल्हास शुरू होता है। वैसे नवरात्री सिर्फ पूजा और उपवास का पर्व नहीं बल्कि आस्था और साधना का उत्सव है।
इन नौ दिनों में मा दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की आराधना होती है। शैल्यपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक हर देवी रूप तक हर रूप जीवन को एक नई दिशा देता है। कहीं आरोग्य का वरदान, कहीं ज्ञान और तपस्या, कहीं ऐसे मुक्ति तो कहीं सुख समृद्धि और सिद्धि की प्राप्ति होती है। ये 9 दिन मां की भक्ति के वो दिन है जब समस्त कामनाएं पूरी होती है।