महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर साहब की 100 वीं जयंती
महान संगीतकार ओ. पी. नैय्यर साहब की 100वीं जयंती 16 जनवरी 2026 को मनाई गई। ओ. पी. नैय्यर साहब एक ऐसा नाम जो केवल भारतीय संगीत के इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी आत्मा में जीवंत रूप से धड़कता है। इस ऐतिहासिक अवसर पर मन गर्व, श्रद्धा, कृतज्ञता और उस महानता को करीब से देखने के सौभाग्य की भावनाओं से भर उठता है।
ओ. पी. नैय्यर केवल एक संगीतकार नहीं थे, वे एक पूरे युग की धड़कन थे। दुर्लभ और निर्भीक प्रतिभा के धनी नैय्यर साहब ने अपनी अनोखी लय, संक्रामक ऊर्जा और मुस्कुराती धुनों से हिंदी फ़िल्म संगीत का व्याकरण ही बदल दिया। उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करती थीं। वे ऊर्जा देती थीं, मन को उठाती थीं और भीतर की मानवीय संवेदना को जगा देती थीं। आज भी उनकी किसी एक धुन की थाप स्मृतियों को जगा देती है, चेहरे पर मुस्कान ले आती है और याद दिलाती है कि संगीत क्यों दिव्य है।
सा रे गा मा के दौरान, जहां नैय्यर साहब एक आदरणीय जज के रूप में शो की शोभा बढ़ाते थे, उनके साथ मेरा जुड़ाव मेरे जीवन के सबसे बड़े आशीर्वादों में से एक है। उनकी उपस्थिति में गरिमा और सौम्यता थी। वे युवा प्रतिभाओं का मार्गदर्शन दृढ़ता, स्नेह और ईमानदारी के अनोखे संगम से करते थे। और जो भी उनके सान्निध्य में रहा, उस पर उनकी अमिट छाप पड़ी।
मुझे वे पल साफ़-साफ़ याद हैं जो उनके कद और विनम्रता को परिभाषित करते हैं। हमारे समय के श्रेष्ठ गायकों में से एक और अत्यंत विनम्र इंसान सोनू निगम मंच पर नैय्यर साहब को आमंत्रित करते और आशीर्वाद पाने के लिए श्रद्धा से उनके चरण स्पर्श करते थे। एक और असाधारण कलाकार और सुंदर आत्मा उनकी विद्या को प्रेम और सम्मान के साथ आत्मसात करते थे। ऐसे कलाकारों के माध्यम से नैय्यर साहब की प्रेरणा नई पीढ़ियों तक सहज रूप से प्रवाहित होती रही।
उनकी कालजयी रचनाओं से परे, संगीत को जीने का उनका ढंग हम सबके लिए प्रेरणा था। उनका अनुशासन, तीक्ष्ण बुद्धि, बालसुलभ आनंद, ईमानदारी और कला के प्रति अटूट समर्पण-हर मुलाकात को यादगार बना देता था। वे केवल संगीत रचते नहीं थे, वे संगीत थे।
लगभग दस अमूल्य वर्षों तक मुझे उनके साथ निकटता से जुड़े रहने का सौभाग्य मिला। स्टूडियो और मंच से परे, हमने जीवन साझा किया। साथ बिताए गए रविवार के लंच पवित्र अनुष्ठान बन गए—स्वर्णिम युग की कहानियां, संगीत, हास्य, ज्ञान और आशीर्वाद से भरे। वे दोपहरें केवल भोजन नहीं थीं। वे गरिमा और प्रेम के पाठ थे। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, आंखें नम हो जाती हैं और दिल भर आता है। वह रिश्ता, हंसी, खामोशिययां, संगीत पर बहसें और स्नेह सब एक साथ लौट आते हैं। ये जीवन भर की पूँजी हैं न भुलाने योग्य, न प्रतिस्थापित करने योग्य।
गजेंद्र सिंह भारतीय टेलीविजन उद्योग के एक प्रतिष्ठित उस्ताद हैं और भारत में रियलिटी टेलीविजन के अग्रदूतों में गिने जाते हैं। दशकों में फैले अपने करियर में उन्होंने नॉन-फिक्शन मनोरंजन को नई परिभाषा दी है और देश के सबसे प्रतिष्ठित, विश्वसनीय और सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली रियलिटी शोज़ रचे हैं।