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हिंदी परीक्षा पर बवाल, बैकफुट पर आई महाराष्ट्र की महायुति सरकार

07 May, 2026 74

संवाददाता/in24 न्यूज़।

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर भाषा का मुद्दा गरमा गया है.और इस बार विवाद के केंद्र में है हिंदी भाषा की परीक्षा। दरअसल महाराष्ट्र सरकार के लिए काम करने वाले अधिकारियों के लिए 28 जून को हिंदी भाषा की परीक्षा आयोजित की जाने वाली थी. लेकिन महायुति सरकार ने अब हिंदी परीक्षा को रद्द कर दिया है.और इसके पीछे वजह बताई जा रही है मनसे समेत कुछ मराठी संगठनों द्वारा जताया आया विरोध। मंत्री उदय सामंत ने इस फैसले की घोषणा करते हुए साफ कहा कि सरकार मराठी अस्मिता से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से ले रही है.यही वजह है कि 28 जून को प्रस्तावित हिंदी परीक्षा अब आयोजित नहीं की जाएगी। मंत्री सामंत ने कहा कि हमारी सरकार इस बात की जांच करेगी कि 1976 के नियमों के तहत होने वाली हिंदी भाषा परीक्षा की प्रासंगिकता अब 2026 के संदर्भ में कितनी रह गई है.इसके बाद ही इस पर फैसला लिया जाएगा। इस फैसले से महाराष्ट्र सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों को राहत मिली है लेकिन महायुति सरकार की किरकिरी हो रही है. 

       दरअसल, महाराष्ट्र में भाषा का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील रहा है. खासकर राज ठाकरे की पार्टी मनसे लगातार मराठी भाषा और मराठी पहचान को लेकर आक्रामक रुख अपनाती रही है. मनसे और कुछ अन्य संगठनों का आरोप था कि सरकारी कर्मचारियों पर हिंदी परीक्षा थोपना मराठी भाषा के महत्व को कम करने जैसा है. इसी विरोध के चलते सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा था. बता दें कि इस फैसले को लेकर राज ठाकरे की पार्टी मनसे ने पहले ही अपनी भूमिका साफ कर दी थी और कहा था कि अगर यह परीक्षा हुई तो राज्य में जो भी स्थिति निर्माण होगी वह सरकार को झेलनी पड़ेगी। मनसे के नेता संदीप देशपांडे ने सरकार को चेतावनी दी थी और कहा था कि अधिकारियों को हिंदी भाषा क्यों सीखनी चाहिए सरकार यह बताएं ? मेरा अनुरोध है कि सरकार इस फैसले को वापस ले वरना 28 तारीख को एग्जाम सेंटर के बाहर जो भी तमाशा होगा उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी।हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार ने यह फैसला कर्मचारियों की सुविधा को ध्यान में रखकर लिया है या फिर राजनीतिक दबाव के आगे झुक गई है? क्योंकि विपक्ष का कहना है कि अगर हिंदी परीक्षा अनिवार्य नहीं थी, तो उसे लेकर इतना विवाद क्यों खड़ा हुआ। और अगर यह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा थी, तो फिर अचानक उसे रद्द क्यों कर दिया गया?.

      राजनीतिक जानकारों की मानें तो आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए महायुति सरकार कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती जो मराठी वोट बैंक को नाराज करे.यही वजह है कि सरकार ने विवाद बढ़ने से पहले ही पीछे हटने में भलाई समझी लेकिन इस फैसले से अब सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं.आलोचकों का कहना है कि सरकार नीतियों पर नहीं, बल्कि दबाव की राजनीति पर फैसले ले रही है। वहीं सरकारी कर्मचारियों के बीच इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई कर्मचारियों का कहना है कि अतिरिक्त परीक्षा का बोझ हटने से उन्हें राहत मिली है…जबकि कुछ लोगों का मानना है कि हिंदी जैसी संपर्क भाषा का ज्ञान प्रशासनिक कामकाज में मददगार साबित होता है---फिलहाल, हिंदी परीक्षा रद्द करने का यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति में नए विवाद को जन्म दे चुका है.अब देखना होगा कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में केवल भाषा तक सीमित रहता है…या फिर सियासी गलियारों में बड़ा राजनीतिक हथियार बन जाता है

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